विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) द्वारा अप्रैल 2020 में महामारी घोषित करने के एक महीने बाद संयुक्त राष्ट्र के विश्व खाद्य कार्यक्रम (डब्ल्यूएफ़पी)  ने चेतावनी जारी की थी कि ‘यदि त्वरित कार्रवाई नहीं की जाती है’ तो साल 2020 के अंत तक कोविड-19 के कारण दुनिया भर में भूख से पीड़ित लोगों की संख्या दोगुनी हो जाएगी।इस बात पर भी ध्यान नहीं दिया गया कि यह संकट खाद्य उत्पादन का संकट नहीं, बल्कि सामाजिक असमानता का संकट है। क्योंकि दुनिया की पूरी आबादी को खिलाने के लिए पर्याप्त भोजन का उत्पादन तो होता है, लेकिन उसके वितरण में भारी असमानताएँ हैं।
Zhong Biao (China), Paradise, 2007.
1990 के दशक में व्यापार विवाद के रूप में जो कुछ शुरू हुआ था, उसे अब केवल अमेरिका के द्वारा चीन के लिए बनाई जा रही अस्तित्व की चुनौती के रूप में वर्णित किया जा सकता है। चीन के ख़िलाफ़ यह ख़तरा पूरी तरह से तर्कसंगत कारणों से खड़ा किया जा रहा है।अमेरिका को इस बात का एहसास है कि चीनी अर्थव्यवस्था धीरे–धीरे दुनिया में सबसे बड़ी बनने जा रही है और एक प्रमुख आर्थिक और तकनीकी शक्ति के रूप में उभरने जा रही है।
1917 की अक्टूबर क्रांति से प्रेरित भारतीय मज़दूर हड़ताल के बाद हड़ताल कर रहे थे, और आख़िरकार 1920 में ऑल इंडिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस का गठन हुआ। अक्टूबर क्रांति से उत्पन्न ऊर्जा और लगातार हड़तालों से बने माहौल में, आज से सौ साल पहले भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन के निर्माण की परिस्थितियाँ निर्मित हुईं।हमारा डोज़ियर संख्या 32 (सितंबर 2020) भारत के कम्युनिस्ट आंदोलन के एक सौ साल का संक्षिप्त इतिहास है।
Gauri Gill, Untitled (32) from the series Acts of Appearance, 2015.
पूँजीवादी व्यवस्था महामारी का शिकार नहीं बनी। शासक वर्ग ने चिंता दूर करने के लिए क़र्ज़ लेने का रास्ता अपनाया।  हालाँकि, महामारी ने पूँजीवादी व्यवस्था को ख़ासे झटके दिए हैं और पूँजीवादी सरकारों व समाजवादी सरकारों के बीच के अंतर स्पष्ट कर दिए हैं। इस हफ़्ते के न्यूज़लेटर में हम महामारी के समय की छ: जटिलताओं को उजागर कर रहे हैं:  मानवता पर हमला, छोटे संपत्ति-धारकों का विनाश, लैंगिग भेदभाव की वापसी, लोकतंत्र पर हमला, पूँजीवाद को बचाने के लिए पर्यावरणीय संकट का उपयोग, और चीन पर हमला करने के लिए संकट का उपयोग।
18 अगस्त को बमको (माली) के बाहर काटी बैरक के सैनिकों ने राष्ट्रपति इब्राहिम बाउबकर केइता (आईबीके) और प्रधान मंत्री बाउबो सीसे को गिरफ़्तार कर लिया और नेशनल कमेटी फ़ॉर द साल्वेशन ऑफ़ द पीपल (सीएनएसपी) स्थापित कर दी।1968 और 2012 में हुए सैन्य तख़्तापलट के बाद माली में यह तीसरा तख़्तापलट है। इस तख़्तापलट को अंजाम देने वाले कर्नलों -मलिक डीयव, इस्माईल वागुए, अस्सिमि गोएता, सादियो कमारा और मोदिबो कोन- ने कहा है कि माली में जैसे ही विश्वसनीय चुनाव कराए जाने की संभावना बनेगी वे सत्ता छोड़ देंगे।
हमारे पास खाने के सामानों से भरी दुकानें होने के बावजूद हम क्यों सड़कों पर भूखे लोग देखते हैं? सबसे ज़्यादा उलझन में डालने वाला जवाब होता है कि भूखे लोग इसलिए भूखे रहते हैं क्योंकि उनके पास पैसे नहीं है, और किसी तरह से धन का अभाव -मानवीय रचनाओं में से सबसे रहस्यमयी निर्मिति- लोगों को भूखा रहने देने के लिए पर्याप्त कारण बन जाता है। इसका मतलब है कि हम –मनुष्य के रूप में- भूखे लोगों से खाद्य पदार्थों की रक्षा करने के लिए पुलिस बलों को हिंसा के उपयोग की अनुमति देते हैं।