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Liu Xiaodong (China), Refugees 4, 2015.

लियू ज़ियाओदोंग (चीन), शरणार्थी 4, 2015

 

प्यारे दोस्तों,

ट्राईकॉन्टिनेंटल: सामाजिक शोध संस्थान की ओर से अभिवादन।

यह कहानी हमारी दुनिया की भयावह परिस्थितियों को बयान करती है: एसोसिएटेड प्रेस के कुछ पत्रकार एक तुर्की तट रक्षक जहाज़ में थे, जिसने 12 सितंबर को एजियन सागर में 18 बच्चों सहित 37 प्रवासियों को प्लास्टिक की बनी नारंगी रंग के दो नौका से उठाया था। ये अफगानिस्तानी शरणार्थी थे। एक ऐसा देश जहाँ युद्ध ख़त्म होता नहीं दिखता। शरणार्थियों में से एक, ओमिद हुसैन नबीज़ादा ने इन पत्रकारों को बताया कि ग्रीक अधिकारियों ने  लेस्बोस में उन्हें पकड़ लिया और इन नौकाओं में बैठाकर समुद्र में छोड़ दिया। उन्हें वहाँ मरने के लिए छोड़ दिया गया था।

1 मार्च से ग्रीस ने शरणार्थियों का शरण लेने का अधिकार ख़त्म कर दिया है। शरणार्थियों को अब अस्थायी शिविरों में रखा जाता है। लेस्बोस (ग्रीस) के मोरिया रिसेप्शन एंड आइडेंटिफिकेशन सेंटर में 3,500 लोगों के रहने की क्षमता है, लेकिन महामारी से पहले एक समय पर वहाँ रहने वालों की संख्या 20,000 तक पहुँच गई थी (हालाँकि महामारी के कारण अब ये संख्या घटकर 12,000 हो गई थी) जब नबीज़ादा और अन्य लोगों को एजियन सागर में नौका से उठाकर बचाया गया, उससे चार दिन पहले मोरिया शिविर में आग लग गई थी। इस आग ने शिविर में रहने वाले लगभग 9,400 लोगों को बेघर कर दिया। मोरिया शिविर को 2015 में बनाया गया था ताकि अफगानिस्तान, सीरिया और पश्चिमी देशों द्वारा थोपे गए युद्ध के शिकार अन्य देशों से यूरोप जाने वाले प्रवासियों को कुछ समय के लिए पनाह दी जा सके।

जब यूरोप के अन्य देशों ने शरणार्थियों के लिए अपने दरवाजे बंद करने शुरू किए, तो ऐसे में शरणार्थी ग्रीस जाने लगे; और मोरिया जैसे खचाखच भरे शिविरों में भरते चले गए।

अगस्त में, ज़ुवारा (लीबिया) के तट पर एक नाव का इंजन फट गया और इस विस्फोट में चाड, माली, घाना और सेनेगल के 45 शरणार्थी मारे गए। सौभाग्य से 37 लोग बच गए और पता चला कि शरणार्थियों को भूमध्य सागर के पार ले जाने वाला रास्ता लगातार इस्तेमाल हो रहा है। हालाँकि, संयुक्त राष्ट्र की शरणार्थी एजेंसी के अनुसार इटली और माल्टा में इस साल 2019 की तुलना में तीन गुना ज़्यादा शरणार्थी पहुँचे हैं। महामारी के बावजूद प्रवासियों के पलायन का सिलसिला जारी है।

ग्रेट लॉकडाउन के दौरान, दुनिया के ज्यादातर हिस्सों में हवाई जहाज़ लगभग ख़ाली उड़ रहे हैं, लेकिन बेहतर जीवन की तलाश में बेपनाह लोग रबर की नावों और पुराने ट्रकों में सफ़र कर रहे हैं।

 

Oweena Camille Fogarty (Mexico), Untitled.

ओवीना केमिले फोगार्टी (मैक्सिको), शीर्षकहीन। 

 

2018 में विश्व बैंक द्वारा किए गए एक अध्ययन से पता चलता है कि दुनिया की आधी आबादी -34 करोड़ लोगग़रीबी रेखा से नीचे रहते हैं। ये संख्या महामारी के दौरान बढ़ी है। विश्व बैंक के अनुसार यदि एक व्यक्ति प्रति दिन 5.50 डॉलर से कम कमाता है, तो वह ग़रीब है। पिछले पचास सालों में, सरकारों ने शिक्षा, बच्चों की देखभाल, स्वास्थ्य, साफ़सफ़ाई और आवास जैसी प्रमुख सामाजिक सेवाओं का तेज़ी से निजीकरण किया है। इसका सबसे बुरा प्रभाव उन पर पड़ा है जिनके पास जीवनयापन के बेहद कम साधन हैं। इसीलिए, 2006 में, अर्थशास्त्री लैंट प्रिटचेट ने सुझाव दिया कि 10 डॉलर प्रति दिन से कम कमाने वाले व्यक्तियों को ग़रीबी रेखा से नीचे माना जाना चाहिए। हालाँकि हम जानते हैं कि इतना कमाने पर भी कोई निजीकृत सेवाओं की लागत नहीं उठा सकता। बहरहाल, 10 डॉलर प्रतिदिन की सीमा के आधार पर प्रिटचेट ने एक महत्वपूर्ण लेख प्रकाशित किया, जिसमें बताया गया कि दुनिया की 88% आबादी ग़रीबी में रहती है।

महामारी के दौरान लगे ग्रेट लॉकडाउन ने दुनिया के अधिकतर लोगों की सामाजिक और आर्थिक स्थिति बिगाड़ दी है। जून में, विश्व बैंक ने अनुमान लगाया था कि लगभग 17.7 करोड़ लोगअत्यधिक ग़रीबीमें चले जाएँगे। ये संख्या पिछले तीस सालों की सबसे बड़ी संख्या है। महामारी के कारण ग़रीबी रेखा के नीचे आने वालों में से आधे लोग दक्षिण एशियाई होंगे और एक तिहाई अफ़्रीका के सहारा क्षेत्र के होंगे।

अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ) के एक नये अध्ययन से पता चलता है कि 2020 के पहले नौ महीनों के दौरान दुनिया भर के कामगारों की आय औसतन 10.7% घट गई; कुल मिलाकर यह 3.5 ट्रिलियन डॉलर के नुक़सान के बराबर है। ग़रीब देशों में, श्रमिकों की आय लगभग 15% घटी, जबकि अमीर देशों में उनकी आय में 9% की गिरावट आई। आईएलओ के अनुसार, 2020 की पहली दो तिमाहियों में रोज़गार लगातार कम हुए हैं, और ये सिलसिला (स्थायी या अस्थायी रूप से) सालभर जारी रहेगा।

 

Maysa Yousef (Palestine), Identity of the Soul, 2014.

मायसा यूसेफ़ (फ़िलिस्तीन), आत्मा की पहचान, 2014। 

 

ओमिद हुसैन नबीज़ादा जैसे प्रवासी रोज़गार की तलाश में अपना देश (जहाँ रोज़गार ख़त्म हो चुका है) छोड़कर ख़तरनाक यात्राएँ करते हैं। इन यात्राओं में यदि वे बच जाते हैं, और कोई छोटीमोटी नौकरी पा लेते हैं, फिर थोड़ा बहुत जो कुछ भी कमाते हैं उसे बचाकर अपने परिवारों को भेजते हैं। 2019 में, ऐसे प्रवासियों ने कुल मिलाकर 55.4 करोड़ डॉलर अपने परिवारों को भेजे। हैती, ताजिकिस्तान और किर्गिस्तान जैसे देश अपने सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के एक चौथाई से भी अधिक के लिए इन प्रवासियों द्वारा भेजे गए पैसे (प्रवासियों द्वारा अपने परिवारों को भेजा गया धन) पर निर्भर करते हैं। अप्रैल 2020 में, विश्व बैंक नेहाल के इतिहास में भेजे गए पैसों में आई सबसे तेज़ गिरावटका अनुमान लगाया था। 19.7% की गिरावट के साथ बाहर से भेजा गया धन 55.4 करोड़ डॉलर से घटकर अब 44.5 करोड़ डॉलर हो गया है। इस गिरावट के साथसाथ प्रत्यक्ष विदेशी निवेश में आई कमी और दक्षिणी गोलार्ध के कई देशों में निर्यात में हो रही गिरावट ने कई देशों के सामने भुगतान की भयानक समस्याएँ खड़ी कर दी हैं।

अमीर बॉन्डहोल्डर्स (लंदन क्लब) और उनका समर्थन करने वाले देशों (पेरिस क्लब) द्वारा ऋण रद्द करने या उचित रूप से ऋण निलंबित करने की माँग ठुकरा दिए जाने के बाद इन देशों पर दबाव बढ़ गया है। इसका प्रभाव प्रवासियों द्वारा भेजे गए धन पर निर्भर करने वाले परिवारों पर भी पड़ेगा, जिनकी आमदनी का एक महत्वपूर्ण स्रोत ख़त्म हो जाएगा।

बुनियादी सेवाओंऔर महामारी के समय में विशेष रूप से स्वास्थ्य देखभालकी कमी और भी गहरा संकट पैदा करेगी। 2017 में, विश्व बैंक और विश्व स्वास्थ्य संगठन ने चेतावनी दी थी कि दुनिया की आधी आबादी के पास आवश्यक स्वास्थ्य सेवाएँ प्राप्त करने के साधन नहीं हैं, और हर साल 10 करोड़ लोग अपनी कम आय से स्वास्थ्य देखभाल की लागत चुका पाने के कारण ग़रीब हो जाते हैं। ये आँकड़ा पूरी तरह से सही नहीं है, क्योंकि अकेले भारत मेंसामाजिक खपत पर हुए एक राष्ट्रीय सर्वेक्षण के अनुसारसाल 2011-12 में स्वास्थ्य देखभाल की लागत के कारण 5.5 करोड़ भारतीय ग़रीब हो गए थे। बहरहाल, इस चेतावनी पर कोई ध्यान नहीं दिया गया।

 

Francisco Amighetti (Costa Rica), La Niña y el viento, 1969.

फ्रांसिस्को अमीगेटी (कोस्टा रिका), वो लड़की और हवा, 1969। 

 

10 सितंबर 2020 को विश्व आत्महत्या रोकथाम दिवस पर डब्ल्यूएचओ के महानिदेशक डॉ. टेड्रोस गेबराइसेस ने दुनिया को याद दिलाया कि हर चालीस सेकंड में कहीं कोई आत्महत्या करता है। उन्होंने ज़ोर दिया किकीटनाशकों और आग्नेयास्त्रों सहितआत्महत्या करने के अन्य साधनों को लोगों से दूर रखा जाना चाहिए। अब हम ग्रामीण भारत की ओर चलते हैं, जहाँ लाखों किसान और कृषि श्रमिक सल्फ़ास खाकर अपनी जान ले चुके हैं। ट्राईकॉन्टिनेंटल: सामाजिक शोध संस्थान के वरिष्ठ फ़ेलो पी. साईनाथ की रिपोर्टों ने आत्महत्या की इस महामारी को उजागर किया। भारत के राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के अनुसार 2019 मेंयानी महामारी से पहलेआत्महत्या करने वाला हर चौथा व्यक्ति दिहाड़ी मज़दूर था। महामारी और ग्रेट लॉकडाउन से यही तबक़ा सबसे बुरी तरह प्रभावित हुआ है। किसानों, कृषि श्रमिकों और दिहाड़ी मज़दूरों पर पड़ने वाले महामारी के सामाजिक प्रभाव को गहराई से समझने के लिए हमें अगले साल की रिपोर्ट आने तक इंतजार करना होगा। बीते महीने कृषिव्यवसाय को बढ़ावा देने वाले तीन कृषि विधेयकों को सरकार द्वारा पारित किया गया, इसका भी प्रत्यक्ष प्रभाव इन्हीं तबक़ों पर पड़ेगा।

 

 

सितम्बर के आख़िरी हफ़्ते में, एक विदेशी संवाददाता आंद्रे वल्तचेक (1962-2020) की इस्तांबुल में मृत्यु हो गई। कुछ साल पहले, आंद्रे ने मुझे क्यूबा के गायक सिल्वियो रोड्रिगेज़ और ख़ासतौर पर उनके गीतला माज़ाके बारे में बताया था। आंद्रे के सम्मान में सिल्वियो के गीत की कुछ पंक्तियाँ:

अगर मैं नहीं करता यक़ीं अपने विश्वास में

अगर मैं नहीं करता यक़ीं किसी पाक चीज़ में 

अगर मैं नहीं करता यक़ीं हर घाव में

अगर मैं नहीं करता यक़ीं पीड़ा में 

अगर मैं नहीं करता यक़ीं याद में 

अगर मैं नहीं करता यक़ीं संघर्ष में

तो कैसा होता मेरा दिल?

कैसा होता मज़दूर का हथौड़ा बिना [लोह] खदान के?

हमारे समय का सबसे बड़ा ज़ुल्म है एक ऐसी सामाजिक व्यवस्था जो भूमध्य सागर में डूबने वालों की तरह दुनिया के अधिकांश लोगों को जीवन जीने के बुनियादी साधनों से वंचित रखती है, ताकि मुट्ठी भर लोग विलासिता का जीवन जी सकें। अगर मैं नहीं करता यक़ीं एक बेहतर दुनिया की, तो मेरा साँस लेना भी मुश्किल होता।

स्नेहसहित

विजय।

 

अहमत टोनक, अर्थशास्त्री, अंतरक्षेत्रीय कार्यालय, ट्राईकॉन्टिनेंटल: सामाजिक शोध संस्थान  

मैं फ़िलहाल पूँजीवादी संकट, रुकी हुई विश्व क्रांति, कोविड-19 के कारण बढ़ी बेरोज़गारी, कल्याणकारी राज्य के वहम और तुर्की की कुल सामाजिक मज़दूरी जैसे विषयों पर एक नोटबुक तैयार कर रहा हूँ।

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